
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने लगभग 60 साल बाद OPEC से बाहर निकलने का ऐलान किया है। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और उत्पादन संतुलन पर बड़ा असर डाल सकता है क्योंकि यूएई इस ग्रुप के बड़े उत्पादकों में शामिल था और एक अहम स्तंभ था।
इस खबर के बाद OPEC एक बार फिर से ट्रेंड कर रहा है। जब बात OPEC की आती है तो OPEC+ भी जहन में आता है। आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे की OPEC और OPEC+ में क्या अंतर है और UAE के इस संगठन से बाहर आने से भारत को फायदा होगा या नुकसान? चलिए डिटेल में जानते हैं।
OPEC क्या है?
OPEC का पूरा नाम Organization of the Petroleum Exporting Countries है जो दुनिया के बड़े तेल निर्यातक देशों का संगठन है। इसकी शुरुआत 1960 में हुई थी। इसका मकसद सदस्य देशों के बीच तेल उत्पादन को नियंत्रित कर ग्लोबल कीमतों को स्थिर रखना है। सऊदी अरब, इराक और ईरान जैसे देश इसमें शामिल हैं। OPEC के फैसले सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को प्रभावित करते हैं, क्योंकि इसके पास बड़े पैमाने पर तेल भंडार और उत्पादन क्षमता है।
OPEC+ क्या है और यह कैसे अलग है?
OPEC+ दरअसल OPEC का विस्तारित ग्रुप है, जिसमें रूस जैसे गैर-OPEC देश भी शामिल हैं। 2016 के बाद यह गठबंधन मजबूत हुआ ताकि वैश्विक तेल सप्लाई पर ज्यादा प्रभाव डाला जा सके। OPEC+ के देश मिलकर उत्पादन घटाने या बढ़ाने का फैसला लेते हैं, जिससे कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। यही वजह है कि इसका असर OPEC से भी ज्यादा व्यापक माना जाता है।
कुल कितने देश?
OPEC में कुल 12 सदस्य देश शामिल हैं- Algeria, Congo, Equatorial Guinea, Gabon, Iran, Iraq, Kuwait, Libya, Nigeria, Saudi Arabia, United Arab Emirates (UAE) और Venezuela। (Angola 1 जनवरी 2024 से बाहर हो चुका है।)
वहीं OPEC+ एक बड़ा समूह है, जिसमें OPEC के साथ 10 गैर-OPEC देश भी शामिल हैं, जैसे Azerbaijan, Bahrain, Brunei, Kazakhstan, Malaysia, Mexico, Oman, Russia, South Sudan और Sudan।
दोनों के बीच मुख्य अंतर यह है कि OPEC की स्थापना 1960 में तेल नीतियों को नियंत्रित करने के लिए की गई थी, जबकि OPEC+ को 2016 में बनाया गया ताकि ज्यादा देशों को साथ लेकर वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव बढ़ाया जा सके।
दुनिया में कुल कितना होता है तेल का उत्पादन?
वैश्विक स्तर पर रोजाना करीब 100 मिलियन बैरल (10 करोड़ बैरल) तेल का उत्पादन होता है। इसमें OPEC देशों की हिस्सेदारी लगभग 30-35% रहती है, जबकि OPEC+ देशों को मिलाकर यह आंकड़ा 50% से अधिक हो जाता है। यानी दुनिया की आधी तेल सप्लाई इसी गठबंधन के फैसलों पर निर्भर करती है, और छोटे बदलाव भी कीमतों में बड़ा उतार-चढ़ाव ला सकते हैं।
UAE के बाहर निकलने का मतलब?
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के OPEC से बाहर निकलने के फैसले ने बाजार में हलचल बढ़ा दी है। संगठन से बाहर आने के बाद UAE अपनी मर्जी से ज्यादा तेल उत्पादन कर सकेगा और नए निवेश को तेजी से आगे बढ़ा पाएगा।
यूएई क्यों आया बाहर?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल-मज़रूई ने कहा कि यह फैसला देश की ऊर्जा रणनीतियों की गहन समीक्षा के बाद लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर किसी अन्य देश से चर्चा नहीं की गई। उनके अनुसार, यह पूरी तरह नीति से जुड़ा निर्णय है, जो मौजूदा और भविष्य के उत्पादन स्तर को ध्यान में रखकर लिया गया है।
भारत को फायदा होगा या नुकसान?
UAE के बाहर निकलने से सबसे बड़ा असर सप्लाई पर पड़ सकता है। अगर UAE उत्पादन बढ़ाता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर दबाव आ सकता है। इससे भारत जैसे आयातक देशों को फायदा मिलेगा, क्योंकि उन्हें सस्ता तेल मिल सकता है।






