
भारतीय रुपये इस समय ऐतिहासिक गिरावट के नए-नए रिकोर्ड बना रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, महंगे कच्चे तेल, विदेशी निवेशकों की भारी निकासी और बढ़ते चालू खाता घाटे (CAD) ने रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा दिया है। भारत जहां 2025 में जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा था वहीं अब भारत 4.15 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ चौथे पायदान से फिसलकर छठे नंबर पर आ गया है।
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96 के पार फिसल चुका है जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इसके साथ ही रुपये मई 2026 में एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बन गया है। चलिए जानते हैं कि आखिर सरकार भारतीय करेंसी को वापस से मचबूत करने के लिए क्या-क्या कर सकती है?
रुपये को मजबूत करने के लिए सरकार कौन-कौन से कदम उठा सकती है?
1) विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचना
जब रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले तेजी से गिरने लगती है, तब RBI बाजार में अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) से डॉलर बेचता है। इससे बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव कम होता है। इसका मकसद रुपये की गिरावट को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि बाजार में घबराहट और ज्यादा उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करना होता है।
2) Trade Deficit को कंट्रोल करना
भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक सामान विदेशों से खरीदता है। जब आयात (Import) ज्यादा और निर्यात (Export) कम होता है, तो Trade Deficit बढ़ता है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
इसीलिए हाल ही में पीएम मोदी ने देशवासियों से सोना ना खरीदने, पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम करने की अपील की थी ताकि देश का डॉलर खर्च कम हो सके।
3) देश में विदेशी निवेशकों के निवेश को बढ़ा कर
सरकार और RBI विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। इसके लिए Foreign Portfolio Investment (FPI) नियमों में ढील दी जाती है और कंपनियों को विदेश से कर्ज (ECB) लेने की अनुमति आसान बनाई जाती है।
जब विदेश से ज्यादा पैसा भारत आता है, तो डॉलर की सप्लाई बढ़ती है और रुपये की मांग मजबूत होती है। इससे रुपये को सहारा मिलता है।
4) इंटरेस्ट रेट को बढ़ा कर
अगर RBI ब्याज दरें बढ़ाता है, तो भारत में निवेश पर मिलने वाला रिटर्न ज्यादा आकर्षक हो जाता है। इससे विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड और शेयर बाजार में ज्यादा पैसा लगाते हैं।
विदेशी निवेश बढ़ने से डॉलर भारत में आता है और रुपये की स्थिति मजबूत होती है। हालांकि ज्यादा ब्याज दरों से लोन महंगे हो सकते हैं और आर्थिक गतिविधियों पर असर भी पड़ सकता है।






