Anti Aging Medicine: बुढ़ापे को मात देने की शुरुआत? पहली बार इंसान को दी गई उम्र घटाने की दवा

AhmadJunaidBlogJune 12, 2026360 Views


Anti Aging Medicine: कल्पना कीजिए कि अगर शरीर की बूढ़ी होती कोशिकाओं को फिर से जवान बनाया जा सके, तो क्या होगा? क्या कमजोर होती आंखों की रोशनी लौट सकती है? क्या उम्र बढ़ने की रफ्तार धीमी हो सकती है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या इंसान एक दिन अमर हो जाएगा?

फिलहाल इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, लेकिन साइंटिस्ट्स ने इस दिशा में एक ऐसा कदम जरूर बढ़ा दिया है, जिसे कुछ साल पहले तक साइंस फिक्शन माना जाता था।

आजतक के रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के बोस्टन स्थित बायोटेक कंपनी लाइफ बायोसाइंसेज ने दुनिया का पहला ‘पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग’ क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिया है। इसके तहत पहली बार एक इंसानी मरीज को ER-100 नाम की एक्सपेरीमेंटल जीन थेरेपी दी गई है। साइंटिस्ट इसे उम्र बढ़ने के असर को कम करने और कुछ हद तक उल्टा करने की दिशा में एक बड़ा अचीवमेंट मान रहे हैं।

किस बीमारी के मरीज पर हो रहा है ट्रायल?

 इस टेक्नॉलॉजी का एक्सपेरिमेंट उन लोगों पर किया जा रहा है जो ग्लूकोमा और उम्र से जुड़ी आंखों की गंभीर बीमारियों की वजह से अपनी रोशनी खो रहे हैं। पहले मरीज की एक आंख में सीधे ER-100 का इंजेक्शन लगाया गया है। शुरुआती ट्रायल में 20 से भी कम मरीज शामिल हैं।

इनका चयन बोस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और चार्ल्सटन के विशेष मेडिकल सेंटरों से किया गया है। अब कई महीनों तक डॉक्टर इन मरीजों पर लगातार नजर रखेंगे ताकि यह समझा जा सके कि यह थेरेपी इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं।

आखिर यह दवा काम कैसे करती है?

इस इलाज की प्रक्रिया थोड़ी अलग है। सबसे पहले मरीज की आंख में एक बार जीन थेरेपी का इंजेक्शन दिया जाता है। इसके बाद कुछ हफ्तों तक एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं।

ये एंटीबायोटिक सिर्फ इंफेक्शन रोकने के लिए नहीं होतीं, बल्कि शरीर के अंदर मौजूद तीन खास रीप्रोग्रामिंग जीनों को ‘ऑन’ करने का काम भी करती हैं। जब ये जीन एक्टिव होते हैं तो कोशिकाओं के अंदर उम्र बढ़ने से जुड़े बदलावों को पीछे धकेलने की प्रोसेस शुरू होता है।

जानवरों पर हुए एक्सपेरिमेंट ट्रायल में इस तकनीक ने काफी उत्साहजनक नतीजे दिए थे। चूहों और बंदरों में ऑप्टिक नर्व के खराब कनेक्शन दोबारा बनने लगे और उनकी खोई हुई रोशनी काफी हद तक वापस आई।

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बुढ़ापा आखिर आता क्यों है?

इस ट्रायल के पीछे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मशहूर साइंटिस्ट डेविड सिंक्लेयर की ‘इन्फॉर्मेशन थ्योरी ऑफ एजिंग’ काम कर रही है। इस थ्योरी के मुताबिक हमारा शरीर सिर्फ इसलिए बूढ़ा नहीं होता कि कोशिकाएं खत्म हो रही हैं। असली समस्या यह है कि समय के साथ कोशिकाएं उन जैविक निर्देशों तक पहुंचने की क्षमता खो देती हैं, जो उन्हें सही तरीके से काम करना सिखाते हैं।

ER-100 इसी खोई हुई ‘जैविक याददाश्त’ को फिर से एक्टिव करने की कोशिश करती है। इसका मकसद कोशिका को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि उसे उसकी युवा अवस्था में वापस लाना है।

आंख को ही क्यों चुना गया?

साइंटिस्ट्स ने सबसे पहले आंख पर प्रयोग इसलिए शुरू किया क्योंकि आंख शरीर का सुरक्षित हिस्सा मानी जाती है। यहां दवा के असर को सीधे देखा जा सकता है और अगर कोई साइड इफेक्ट सामने आता है तो उस पर नजर रखना भी आसान होता है। इसलिए उम्र से जुड़ी बीमारियों के खिलाफ इस नई तकनीक का पहला बड़ा एक्सपेरिमेंट आंखों में किया जा रहा है।

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नोबेल पुरस्कार से क्या है इसका कनेक्शन?

इस पूरी टेक्नॉलॉजी की जड़ें जापानी साइंटिस्ट शिन्या यामानाका की उस खोज में हैं, जिसने चिकित्सा विज्ञान की दुनिया बदल दी थी। साल 2006 और 2007 में यामानाका ने दिखाया था कि चार खास प्रोटीनों की मदद से किसी भी वयस्क कोशिका को फिर से स्टेम सेल में बदला जा सकता है। इन्हें आज ‘यामानाका फैक्टर्स’ कहा जाता है।

इस खोज ने साबित किया कि कोशिकाओं की जैविक घड़ी को पीछे ले जाना संभव है। इसी क्रांतिकारी काम के लिए उन्हें 2012 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला था।

 एक्सपेरिमेंट में खतरा कहां है?

यहीं सबसे बड़ी चुनौती भी छिपी है। अगर किसी कोशिका को पूरी तरह रीसेट कर दिया जाए तो वह अपनी पुरानी पहचान खोकर स्टेम सेल बन सकती है। ऐसी कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं और कैंसर या ट्यूमर का खतरा पैदा कर सकती हैं।

इसी वजह से वैज्ञानिकों ने ‘पार्शियल रीप्रोग्रामिंग’ का रास्ता चुना है। इसमें कोशिका को पूरी तरह नया नहीं बनाया जाता, बल्कि उसकी उम्र बढ़ने के प्रोसेस को कुछ कदम पीछे ले जाने की कोशिश की जाती है। यानी आंख की कोशिका आंख की कोशिका ही रहे, लेकिन ज्यादा युवा और स्वस्थ तरीके से काम करे।

फिर भी जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगर रीप्रोग्रामिंग जीन जरूरत से ज्यादा समय तक एक्टिव रहे तो कोशिकाएं असामान्य व्यवहार कर सकती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इसीलिए फिलहाल यह फेज-1 ट्रायल सिर्फ दो बातों पर केंद्रित है, सुरक्षा और सही डोज।

एक्सपेरिमेंट के बाद आगे क्या?

यह ट्रायल सिर्फ आंखों की बीमारी के मरीजों पर शुरू हुआ है और अभी यह साबित होना बाकी है कि यह तकनीक इंसानों में सुरक्षित और प्रभावी है या नहीं। लेकिन अगर आने वाले सालों में इसके नतीजे अच्छे रहते हैं, तो यही तकनीक एक दिन अल्जाइमर, गठिया, दिल की बीमारियों और उम्र से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं के इलाज का रास्ता खोल सकती है।

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