
भारत के कॉरपोरेट सेक्टर में ग्रीन ट्रांजिशन की रफ्तार तेज हो रही है और कंपनियां एनर्जी जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न तकनीकों के मिश्रण पर विचार कर रही हैं। हालांकि उद्योग जगत के कई नेताओं का मानना है कि लंबी अवधि में न्यूक्लियर एनर्जी ही सबसे भरोसेमंद और टिकाऊ ऑप्शन बनकर उभर सकती है।
बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स इवेंट पर चर्चा के दौरान टाटा स्टील के वाइस प्रेसिडेंट-सेफ्टी, हेल्थ एंड सस्टेनेबिलिटी राजीव मंगल ने कहा कि भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए न्यूक्लियर ऊर्जा पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
सोलर और विंड की सीमाएं, न्यूक्लियर पर बढ़ता फोकस
राजीव मंगल ने कहा कि शांति (SHANTI) एक्ट पारित होने के बाद भारत ने अच्छी शुरुआत की है। उनके मुताबिक, जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, केवल सोलर और विंड एनर्जी पर निर्भर रहना संभव नहीं होगा क्योंकि इनकी अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी अपने भारतीय प्लांट में यूरोप के कुछ पर्यावरणीय स्टैंडर्ड को अपनाने की दिशा में काम कर रही है।
एलएंडटी के चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर संतोष सिंह ने कहा कि एनर्जी सिक्योरिटी सुनिश्चित करने के लिए किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय सभी उपलब्ध विकल्पों का इंटीग्रेशन जरूरी है। उन्होंने कहा कि एलएंडटी लंबे समय से भारत के न्यूक्लियर कार्यक्रम का हिस्सा रही है और साथ ही कंपनी ग्रीन हाइड्रोजन तथा बड़े नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रही है।
जेएसडब्ल्यू के चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर प्रभोदा आचार्य ने कहा कि भारत को अपनी जरूरतों के अनुरूप ऊर्जा परिवर्तन का रास्ता तैयार करना होगा। उनके अनुसार देश की यात्रा ग्रे से ब्राउन, फिर कम ब्राउन, हल्के ग्रीन और अंत में पूरे ग्रीन मॉडल की ओर बढ़ेगी।
सीईईडब्ल्यू के फेलो और डायरेक्टर कार्तिक गणेशन ने कहा कि SHANTI एक्ट में देयता (लायबिलिटी) से जुड़े प्रावधानों पर अभी और स्पष्टता की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन इलाकों को नए न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स के लिए चुना जाएगा, वहां रहने वाले लोगों के बीच भरोसा पैदा करना बेहद जरूरी होगा।






