
₹17 लाख सालाना पैकेज वाली बैंकिंग नौकरी छोड़ने का फैसला, और उसकी वजह- यही कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है।
IIT दिल्ली के ग्रेजुएट चिराग मदान ने बताया कि उन्होंने कॉर्पोरेट बैंकिंग सेक्टर की नौकरी लंबे समय तक बढ़ते तनाव, काम के दबाव और बिगड़ते वर्क-लाइफ बैलेंस के कारण छोड़ी। उनका वीडियो वायरल होने के बाद युवा प्रोफेशनल्स के बीच नई बहस छिड़ गई है।
9 से 5 नहीं, 9 से 7 की नौकरी
मदान के मुताबिक, शुरुआत में नौकरी का समय सामान्य 9 से 5 जैसा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह 9 से 7 तक खिंच गया। इतना ही नहीं, पांच दिन का वर्क वीक भी कई बार छह दिन में बदल गया। इससे निजी समय लगभग खत्म हो गया और थकान लगातार बढ़ती गई।
लंच ब्रेक भी ‘लक्ज़री’
उनकी बात का सबसे चर्चित हिस्सा लंच ब्रेक रहा। मदान ने कहा कि कर्मचारियों को 10-15 मिनट में ही लंच खत्म करने की उम्मीद की जाती थी। लगातार काम के दबाव के बीच यह भी एक तरह का स्ट्रेस फैक्टर बन गया, जिसने ‘हसल कल्चर’ पर सवाल खड़े कर दिए।
बीमार पड़ना भी आसान नहीं
मदान ने यह भी दावा किया कि बीमार होने पर छुट्टी लेना आसान नहीं था। कर्मचारियों को छुट्टी के लिए विस्तार से कारण बताना पड़ता था। कई लोगों के लिए यह अनुभव उस संस्कृति का प्रतीक बन गया, जहां काम को प्राथमिकता और सेहत को नजरअंदाज किया जाता है।
करोड़ों के टारगेट का दबाव
काम का दबाव सिर्फ घंटों तक सीमित नहीं था। मदान के अनुसार, कर्मचारियों को ₹10 करोड़ तक के डील क्लोज करने के टारगेट दिए जाते थे। टारगेट मिस होने पर बार-बार रिव्यू और बढ़ती निगरानी से दबाव और बढ़ जाता था। उन्होंने कहा कि यह लगातार चलने वाला दबाव लंबे समय तक झेलना मुश्किल हो गया।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
वीडियो वायरल होने के बाद लोगों की राय बंटी हुई दिखी। कुछ यूजर्स ने उनके फैसले की तारीफ करते हुए कहा कि ‘सैलरी से ज्यादा जरूरी जिंदगी की क्वालिटी है।’ वहीं, कुछ ने इसे कॉर्पोरेट सेक्टर की आम हकीकत बताया।
एक यूजर ने लिखा कि अच्छा किया… अब कम से कम बैंक का नाम भी बताओ। दूसरे ने कहा, ‘ज्यादातर सेक्टर्स में यही हाल है, सिस्टम ही खराब है।’ वहीं, एक अन्य ने सलाह दी कि IIT बैकग्राउंड के साथ टेक सेक्टर बेहतर विकल्प हो सकता है।






