
India-EU FTA: हाल ही में भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) ने ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन किया था, जिसके तहत भारत और यूरोपीय यूनियन के देशों को एक-दूसरे की मार्केट का फ्री एक्सेस मिला। इस डील की मदद से भारत यूरोपीय यूनियन के सभी देशों की मार्केट में बिना टैरिफ के अपने प्रोडक्ट बेच सकेगा।
इसी नए अवसर को देखते हुए इंडियन जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) ने अनुमान लगाया है कि इस एफटीए की मदद से अगले तीन सालों में भारत और ईयू का व्यापार दोगुना होकर 10 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
यूरोपीय यूनियन में यूरोप के 27 देश शामिल हैं, जिससे यह एक बड़ा बाजार बन जाता है। अब भारत-ईयू एफटीए के बाद भारतीय रत्न और ज्वेलरी कारोबारियों के लिए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार खुल गया है, जहां वे बिना रुकावट अपना सामान बेच सकेंगे। साथ ही एफटीए के लागू होने के बाद भारत के कारोबारी अब चीन, थाईलैंड और हांगकांग जैसे देशों के साथ यूरोप की मार्केट में कंपीटिशन करेंगे।
एफटीए से मिलेगा एक्सपोर्ट को बढ़ावा
भारत-ईयू एफटीए के बाद GJEPC को उम्मीद है कि अगले तीन सालों में भारत और यूरोपीय यूनियन का व्यापार दोगुना होकर 10 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। भारतीय रुपये में यह आंकड़ा लगभग 91,000 करोड रुपये के बराबर है।
फिलहाल भारत और ईयू का कुल व्यापार 5.2 अरब डॉलर है, जिसमें भारत के निर्यात 2.7 अरब डॉलर और ईयू से आयात 2.5 अरब डॉलर का है।
2024 में भारत ने 30 अरब डॉलर के रत्न और ज्वेलरी का निर्यात किया था, जिसमें से 628 मिलियन डॉलर का निर्यात अकेले ईयू को हुआ। ईयू को किए जाने वाले निर्यात में सबसे ज्यादा हिस्सा प्रेशियस ज्वेलरी का था, जिसकी कीमत 57.30 करोड डॉलर थी। साथ ही 5.5 करोड डॉलर के फैशन से जुड़े प्रोडक्ट भी शामिल थे।
माना जा रहा है कि एफटीए की वजह से भारत के जेम्स और ज्वेलरी एक्सपोर्ट में तेजी आएगी। GJEPC के अध्यक्ष किरीट भंसाली (Kirit Bhansali) का कहना है कि इस डील के बाद गुजरात, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को मदद मिलेगी, जो जेम्स और ज्वेलरी जैसे कीमती सामान के उत्पादन और निर्यात में आगे हैं।
हाल ही में अमेरिका को किए जाने वाले प्रेशियस जेम्स और ज्वेलरी निर्यात में 44 प्रतिशत की कमी आई थी, जिससे कारोबारियों को नुकसान हुआ। ऐसे में ईयू की मार्केट का खुलना नुकसान की भरपाई में मददगार साबित हो सकता है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि यूरोपीय यूनियन में निर्यात बढ़ाना इतना आसान नहीं होगा। GJEPC के कार्यकारी निदेशक सब्यसाची रे (Sabyasachi Ray) ने इस बात पर जोर दिया कि ईयू मार्केट अमेरिका से काफी अलग है। यूरोप एक हाई वैल्यू मार्केट है, जहां लोग हाई क्वालिटी, बेहतर फिनिशिंग और आधुनिक डिजाइन को ज्यादा महत्व देते हैं। ऐसे में अगर भारतीय कारोबारियों को यूरोप में अपने निर्यात बढ़ाने हैं तो उन्हें अपनी क्षमता और क्वालिटी दोनों बढ़ानी होंगी।
इसके अलावा भले ही टैरिफ जैसी रुकावटें हट गई हों, लेकिन ईयू में कई अन्य सख्त स्टैंडर्ड लागू हैं, जिनका पालन करना जरूरी है। ईयू अपने बाजार में बिकने वाले प्रोडक्ट की ट्रेसबिलिटी की जांच करता है।
साथ ही यह भी देखा जाता है कि सामान के मैन्युफैक्चरिंग में पर्यावरण, सामाजिक और अन्य स्टैंडर्ड्स का पालन हुआ है या नहीं। इसके अलावा ईयू के देश सोना, चांदी और हीरे जैसी कीमती धातुओं की रियल टाइम प्राइसिंग की भी जांच करते हैं। ऐसे में अगर भारत को अपने निर्यात ईयू में बढ़ाने हैं, तो इन सभी स्टैंडर्ड्सऔर नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।






