Budget 2026: ई-कॉमर्स सेक्टर की बड़ी मांगें, सस्टेनेबल पैकेजिंग से लेकर ग्लोबल मार्केट तक गेम बदलने की तैयारी

AhmadJunaidBlogJanuary 28, 2026361 Views


Union Budget 2026: वित्त वर्ष 27 के लिए बजट पेश होने में अब कुछ ही दिन बचे हैं। इससे पहले ई-कॉमर्स सेक्टर ने अपनी उम्मीदें जताई है। चलिए विस्तार से जानते हैं।

DCGpac के फाउंडर और सीईओ और DTDC के बोर्ड मेंबर सुरेश बंसल  का कहना है कि भारत जब आर्थिक विकास के अगले फेज में प्रवेश कर रहा है, तो यूनियन बजट में सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग, एमएसएमई को मजबूती और टेक्नोलॉजी आधारित सप्लाई चेन पर फोकस और मजबूत होना चाहिए। उनके मुताबिक पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और ई-कॉमर्स भारत की कंजम्प्शन इकॉनमी की रीढ़ हैं, लेकिन इन्हें जिम्मेदारी से आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा नीतिगत समर्थन की जरूरत है।

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उन्होंने उम्मीद जताई कि बजट में रीसायक्लेबल और इको-फ्रेंडली पैकेजिंग को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव दिए जाएंगे, सस्टेनेबल मटीरियल पर जीएसटी ढांचे को सरल किया जाएगा और री-यूज व पैकेजिंग-एज़-ए-सर्विस जैसे सर्कुलर इकॉनमी मॉडल को तेजी से अपनाने पर जोर होगा। इसके साथ ही एमएसएमई के लिए आसान कर्ज और तेज जीएसटी रिफंड से पूरे वैल्यू चेन में लिक्विडिटी और मजबूती बढ़ेगी।

सुरेश बंसल के अनुसार डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई अपनाने और स्किल डेवलपमेंट में निवेश भी उतना ही जरूरी है, जिससे भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें और कचरे व उत्सर्जन को कम किया जा सके। ऐसा बजट, जो विकास और सस्टेनेबिलिटी को साथ लेकर चले, न सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग और ई-कॉमर्स को मजबूत करेगा बल्कि भारत को जिम्मेदार सप्लाई चेन का वैश्विक लीडर भी बना सकता है।

शॉप कल्चर की संस्थापक और ग्लोबल सीईओ, सुबर्णा मुखर्जी ने कहा कि  बजट 2026 से ई-कॉमर्स सेक्टर को ऐसी नीतियों की उम्मीद है जो सिर्फ तेज विस्तार नहीं, बल्कि मुनाफे और ग्लोबल कंपीटिशन को भी बढ़ावा दें।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ साल में डिजिटल-फर्स्ट ब्रांड्स के लिए ग्राहकों को जोड़ने की लागत 30-40% तक बढ़ गई है, जबकि लॉजिस्टिक्स, विज्ञापन और नियमों से जुड़े खर्च बढ़ने के कारण मुनाफा दबाव में है। एक्सपर्ट ने कहा कि अब जरूरत है कि फोकस, निर्यात और डिजिटल क्षमताओं के निर्माण पर हो।

सुबर्णा मुखर्जी ने आगे कहा कि क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स भारत के लिए बड़ा मौका है, क्योंकि भारत का ई-कॉमर्स निर्यात अभी 10 अरब डॉलर से भी कम है, जबकि चीन का 300 अरब डॉलर से ज्यादा है। अगर निर्यात नियम आसान हों, सीमा-पार लॉजिस्टिक्स तेज हो और वैश्विक मार्केटप्लेस पर बेचने वाले भारतीय ब्रांड्स को खास प्रोत्साहन मिले, तो यह अंतर कम किया जा सकता है।

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