
Rupee: भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 96.88 पर पहुंच गया। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और मजबूत डॉलर ने भारत की करेंसी पर दबाव बढ़ाया है। ईरान तनाव और महंगाई की चिंता के बीच निवेशकों ने इमर्जिंग मार्केट से दूरी बनानी शुरू कर दी है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ गया।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाया दबाव
अमेरिका के 30 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 5.18 फीसदी तक पहुंच गई है। यह स्तर 2008 की वैश्विक वित्तीय संकट से पहले के दौर के करीब माना जा रहा है। निवेशकों ने अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर अपनी उम्मीदों का फिर से आकलन किया है।
लगातार ऊंची महंगाई और ईरान संघर्ष से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव ने बाजार की चिंता बढ़ाई है। हाई बॉन्ड यील्ड की वजह से डॉलर और मजबूत हुआ, जिससे रुपये समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया।
रुपया क्यों टूट रहा है?
एनालिस्ट के मुताबिक, रुपये पर एक साथ कई ग्लोबल दबाव काम कर रहे हैं। इनमें मजबूत डॉलर, बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और आयातकों की लगातार डॉलर मांग शामिल है।
ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है। पिछले कारोबारी सत्र में भी रुपया इंट्राडे में 96.61 तक फिसला था और आखिर में 96.54 पर बंद हुआ था।
महंगाई बढ़ने का खतरा
इंडिया टुडे के रिपोर्ट के मुताबिक एक्सिस डायरेक्ट के राजेश पलविया ने कहा कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने डॉलर को मजबूत बनाए रखा है, जिससे रुपया नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया।
एक्सपर्ट का मानना है कि रुपये में लगातार कमजोरी से भारत में आयातित महंगाई बढ़ सकती है। पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेश से आने वाले अन्य सामान महंगे हो सकते हैं।






