
Akshaya Tritiya Special: निवेश की दुनिया में एक पुराना विश्वास है कि सोना और शेयर बाजार हमेशा उलटी दिशा में चलते हैं। लेकिन हालिया स्टडी इस धारणा को पूरी तरह चुनौती देती है। बिजनेस टुडे ने स्टेपट्रेड कैपिटल की रिपोर्ट के हवाले से बताया की लंबी अवधि में दोनों एसेट क्लास एक जैसे साइकल फॉलो करते हैं और उनके बीच बना गैप समय के साथ भर जाता है।
शॉर्ट टर्म में अलग, लॉन्ग टर्म में एक जैसा ट्रेंड
रिपोर्ट के मुताबिक, अनिश्चितता के दौर में सोना बेहतर प्रदर्शन करता है- जैसे जियोपॉलिटिकल तनाव, कमजोर ग्रोथ या कम ब्याज दरें। वहीं, आर्थिक रिकवरी के समय शेयर बाजार तेजी पकड़ता है। हालांकि, ये अंतर स्थायी नहीं होता।
2015 से 2026 तक का पैटर्न
2015 के बाद के दौर में सोने ने बढ़त बनाई, जबकि सेंसेक्स दबाव में रहा। लेकिन करीब 14 महीनों में बाजार रिकवर हुआ और गैप खत्म हो गया। 2020 में कोविड के दौरान भी यही ट्रेंड दिखा- सोना चमका, बाजार गिरा। लेकिन जैसे ही रिकवरी शुरू हुई, सेंसेक्स ने तेजी से वापसी की और अंतर 11 महीनों में खत्म हो गया।
2026 में भी कुछ ऐसा ही सेटअप दिख रहा है। सोना जियोपॉलिटिकल तनाव और सेफ-हेवन डिमांड से मजबूत हुआ है, जबकि सेंसेक्स पर वैल्यूएशन, ब्याज दर और लिक्विडिटी का दबाव है।
एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?
स्टेपट्रेड कैपिटल के फंड मैनेजर अंकुश जैन का कहना है कि इतिहास बताता है कि यह गैप अंत में शेयर बाजार की तेजी से भरता है, न कि सोने की लगातार बढ़त से।
वहीं इन्वेस्टवैल्यू कैपिटल के पोर्टफोलियो मैनेजर सिद्धार्थ पुरोहित के मुताबिक सोना इक्विटी का विकल्प नहीं, बल्कि डाइवर्सिफायर है, जो पोर्टफोलियो के जोखिम को कम करता है।
इंदिरा सिक्योरिटीज के मैनेजिंग डायरेक्टर नवी विजय रामावत ने कहा कि सोना अस्थिर समय में सुरक्षा देता है, लेकिन लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन के लिए शेयर बाजार ही मुख्य इंजन है।
निवेशकों के लिए क्यो हो रणनीति?
एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि इसे ‘या तो-या’ का सवाल नहीं मानना चाहिए। सही तरीका एसेट एलोकेशन है। आम तौर पर 70-75% इक्विटी, 10-15% सोना और बाकी फिक्स्ड इनकम में निवेश संतुलित पोर्टफोलियो देता है। सोने में धीरे-धीरे निवेश करना बेहतर माना जाता है, खासकर अनिश्चितता के समय। वहीं, शेयर बाजार लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न का जरिया बना रहता है।





