सिर्फ ₹12 लाख नहीं, सही स्ट्रक्चर से FY27 में ₹14.6 लाख तक की इनकम हो सकती है टैक्स फ्री – जानिए कैसे

AhmadJunaidBlogFebruary 6, 2026359 Views


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भले ही बजट 2026 में इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया हो, लेकिन सैलरी पाने वाले लोगों के पास अब भी टैक्स बचाने का बड़ा मौका है। नए टैक्स रिजीम में 12 लाख रुपये तक की इनकम पर सेक्शन 87A के तहत रिबेट मिलने से टैक्स नहीं देना पड़ता। लेकिन सही प्लानिंग से यह सीमा और बढ़ाई जा सकती है।

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टैक्स एक्सपर्ट के अनुसार, अगर कर्मचारी अपनी सैलरी स्ट्रक्चरिंग सही तरीके से करें और नियोक्ता (एम्प्लॉयर) द्वारा EPF और NPS जैसे रिटायरमेंट स्कीम में योगदान को ऑप्टिमाइज करें, तो करीब 14.65 से 14.66 लाख रुपये तक की सैलरी पर भी कानूनी रूप से शून्य (0) टैक्स चुकाया जा सकता है। यह फायदा स्टैंडर्ड डिडक्शन और नए टैक्स रिजीम में उपलब्ध कुछ विशेष छूटों व डिडक्शन को जोड़ने से मिलता है।

टैक्स कैलकुलेशन

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए लागू नए टैक्स रिजीम में सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। इसके अलावा, नियोक्ता द्वारा EPF और NPS में किए गए योगदान को तय सीमा तक या तो टैक्सेबल सैलरी से बाहर रखा जाता है या फिर डिडक्शन के रूप में फायदा मिलता है।

अगर सैलरी स्ट्रक्चर सही तरीके से बनाया जाए, तो टैक्सेबल इनकम को 12 लाख रुपये या उससे कम लाया जा सकता है। ऐसा होने पर सेक्शन 87A के तहत 60,000 रुपये तक की रिबेट मिलती है, जिससे पूरी टैक्स देनदारी शून्य हो जाती है।

टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि अधिकतम टैक्स-फ्री सैलरी का फायदा तब मिलता है जब EPF और NPS दोनों को सैलरी स्ट्रक्चर में शामिल किया जाए। अगर बेसिक सैलरी को कुल CTC का लगभग 50% रखा जाए और EPF व NPS में योगदान ठीक तरह से तय किया जाए, तो करीब 14.65 लाख रुपये तक की सैलरी पर भी कानूनी रूप से कोई टैक्स नहीं देना पड़ सकता।

EPF और NPS को साथ मिलाकर कैसे मिलता है फायदा?

मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 7.32 लाख रुपये है। इस पर नियोक्ता का 12% EPF योगदान करीब 87,900 रुपये बनता है, जिसे टैक्स योग्य आय में नहीं जोड़ा जाता। इसके बाद बाकी सैलरी पर 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन लागू होता है।

साथ ही, नियोक्ता द्वारा बेसिक सैलरी का 14% तक NPS में योगदान (करीब 1.02 लाख रुपये) सेक्शन 80CCD(2) के तहत डिडक्शन के रूप में मिलता है। इन सभी छूटों को जोड़ने पर टैक्स योग्य आय 12 लाख रुपये से कम हो जाती है, जिससे सेक्शन 87A के तहत मिलने वाली रिबेट से पूरा टैक्स खत्म हो सकता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि EPF, NPS और सुपरएन्नुएशन फंड में नियोक्ता के कुल योगदान की सालाना सीमा 7.5 लाख रुपये है। इस उदाहरण में कुल योगदान इस सीमा के अंदर ही रहता है, इसलिए नियमों का उल्लंघन भी नहीं होता।

अगर सिर्फ EPF की सुविधा हो तो क्या होगा?

टैक्स एक्सपर्ट के अनुसार, अगर किसी कर्मचारी को केवल EPF की सुविधा मिलती है और NPS उपलब्ध नहीं है, तो टैक्स-फ्री सैलरी की अधिकतम सीमा कम हो जाती है। ऐसे मामलों में नए टैक्स रिजीम के तहत करीब 13.56 लाख रुपये तक का CTC टैक्स-फ्री रखा जा सकता है।

मान लीजिए बेसिक सैलरी लगभग 6.78 लाख रुपये है। इस पर नियोक्ता का 12% EPF योगदान करीब 81,360 रुपये होगा, जो टैक्स से मुक्त रहता है। इसके बाद 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन लागू करने पर टैक्स योग्य आय 12 लाख रुपये से थोड़ा कम रह जाती है, जिससे सेक्शन 87A के तहत पूरी रिबेट मिल जाती है और टैक्स शून्य हो सकता है। हालांकि, NPS में नियोक्ता का योगदान न होने से कुल टैक्स-फ्री सैलरी की सीमा कम हो जाती है।

EPF में नियोक्ता का योगदान बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते (DA) के 12% तक ही टैक्स-फ्री है। प्राइवेट कर्मचारियों के लिए NPS में नियोक्ता का योगदान बेसिक सैलरी के 14% तक डिडक्शन योग्य है। साथ ही EPF, NPS और सुपरएन्नुएशन फंड में नियोक्ता के कुल योगदान की सालाना सीमा 7.5 लाख रुपये है। खास बात यह है कि नए टैक्स रिजीम में कर्मचारी द्वारा किए गए योगदान पर अलग से डिडक्शन नहीं मिलता।

एक्सपर्ट का कहना है कि यह पूरा फायदा सैलरी स्ट्रक्चर और नियोक्ता की भागीदारी पर निर्भर करता है। कर्मचारियों को अपने CTC स्ट्रक्चर की समीक्षा नियोक्ता के साथ मिलकर करनी चाहिए, ताकि टैक्स और प्रोविडेंट फंड के नियमों का पालन हो सके। सही योजना के साथ नया टैक्स रिजीम सैलरी पाने वालों के लिए अब भी अच्छा टैक्स बचत का मौका दे सकता है।

 

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